
किसी ने लिखा है कि - बचपन का जमाना होता था, खुशियों का खजाना होता था। चाहत चांद को पाने की और दिल तितली का दीवाना होता था। इंसान के अतीत में बचपन का अहम रोल होता है। अनजान बचपन हर चीज को पाने की ख्वाहिश पाल लेता है। अतीत में कई लम्हें ऐसे हैं, जिन्हें भुलाया जा सकता है, लेकिन बचपन नहीं। पुरानी आबादी निवासी 72 वषीüय दानाराम छींपा बताते हैं कि पुराने समय में स्कूलों में पढ़ाई का तरीका अलग होता था। तब वाणिज्य शिक्षा में सवाइया, पव्वा व अद्धा आदि शब्दों का इस्तेमाल किया जाता था। अब इसका प्रचलन नहीं है। वे बताते हैं कि 64 पैसे का एक रुपया होता था, बंटवारे के काफी समय बाद 100 पैसे का एक रुपया हुआ। पाई, धेला और 64 पैसे का रुपया चलता था। उन्होंने बताया कि करीब 1945 मेंे यहां पहली बस चलाई गई, जिसका रूट पदमपुर से गंगानगर का कच्चा रास्ता था। पçब्लक पार्क में वह बस खड़ी रहती थी। वे बताते हैं कि बंटवारे से पहले कुछ ही ट्रेनें चला करती थीं, जिनमें से एक कलकत्ता टू कराची (केके) जो हिंदुमलकोट से होकर गुजरती थी। निकटवतीü गांव बख्तांवाली, ढींगावाली आदि जगह मुसलिमों की संख्या अधिक थी। बंटवारे के दौरान पाक जाने वाले मुसलिमों ने पुरानी आबादी स्थित कोçढ़यों वाली पुली के निकट तीन दिन तक शरणस्थली बनाए रखी। इस दौरान मुसलिमों ने बैल-ऊंटगाड़ों पर सामान लाद रखा था। पलंग व अन्य घरेलू सामान उन्होंने यहां लोगों को बेच दिया। वह बड़ा अजीब सा दृश्य था, जो आज तक याद है।