Tuesday, February 3, 2009

मोहल्लेवालों के एकमत से रखी गई थी हनुमान मंदिर की नींव


इंसान का अतीत से जुड़ाव तो हमेशा ही रहता है और अतीत में लौटना कई बार अच्छा भी लगता है। अतीत यादों का वो पिटारा है, जिसे चाहकर भी नहीं भुलाया जा सकता। उम्र के 87वें वर्ष में प्रवेश कर चुके ज्ञानचंद नागपाल ने बताया कि 1947 के वक्त जब हालात तनावपूर्ण हो गए थे, तब पाकिस्तान में एक मुसलिम व्यक्ति ने उनकी मदद की थी। जिसकी बदौलत वे सही-सलामत भारत पहुंचे, तो कैसे भूल जाएं अतीत को। पाकिस्तान के बहावलपुर में जन्मे ज्ञानचंद नागपाल वर्तमान में एल ब्लॉक में रह रहे हैं। उनके दो पुत्र व पांच पुत्रियां हैं। पौते-पौतियों के साथ कभी घर में तो कभी पार्क में मनोरंजन करना उन्हें अच्छा लगता है। वे बताते हैं कि आज तो चार-चार मंजिला कोठियां बनी हुई हैं, तब गारे से बने घरों में लोग रहा करते थे। वे बताते हैं कि 1953-54 हनुमान मंदिर के स्थान पर एक डिग्गी हुआ करती थी, जो थोड़े समय बाद बंद हो गई। इसके बाद यहां रह रहे लोगों ने उक्त स्थान पर हनुमान मंदिर बनवाने के लिए प्रस्ताव रखा। धामिüक स्थल के नाम पर किसी ने आपçत्त नहीं जताई। उन्होंने बताया कि क्षेत्र में रेलवे स्टेशन रोड स्थित सिंहसभा गुरुद्वारा सबसे पुराना है। जब वे छोटे-छोटे हुआ करते थे, तबसे इस गुरुद्वारे को देखते आ रहे हैं। बकौल ज्ञानचंद नागपाल आज क्षेत्र में श्रद्धा व आस्था का जो भाव है, उसके देखने मन को खुशी मिलती है। आपसी सद्भाव और एकता से इंसान बहुत कुछ कर सकता है। बीते वक्त मेंे कुछ लम्हें ऐसे भी हैं, जिन्हें वे भुला देना ही उचित समझते हैं, वह चाहे भारत-पाक बंटवारा हो या फिर दंगों का समय।

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