Thursday, February 12, 2009

नेहरू पार्क वाली जगह पर मनाया जाता था दशहरा


समय के साथ हर चीज में बदलाव आना स्वाभाविक है। इसलिए अतीत में ही खोए रहना उचित नहीं। यदि अतीत के साथ चिपके रह जाएंगे, तो वर्तमान जीवन की कई चीजों से हम वंचित रह जाएंगे। करीब 70 वषीüय भागीरथ स्वामी बताते हैं कि इंसान को समय के साथ चलना चाहिए। कल तक उच्च शिक्षा बड़े शहरों तक ही सीमित थी, लेकिन आज करीबन देश के कोने-कोने तक उच्च शिक्षण संस्थान बने हैं। इसे बुजुçर्गयत की बातों (पुराना समय ही अच्छा था) के प्रति नकारात्मक रुख न माना जाए, क्योंकि उच्च शिक्षा कल भी जरूरी थी और आज भी। कल जिनका अभाव था, आज वो साधन मौजूद हैं। स्वामी बताते हैं कि तब वे निकटवतीü गांव 15 जैड से शहर में पढ़ने के लिए पैदल आते थे। आज एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले में स्कूल जाने के लिए बच्चों को रिक्शा की जरूरत पड़ती है। थोड़े बड़े हुए तो मोटरसाइकिल भी चाहिए। मूल रूप से 15 जैड गांव के निवासी भागीरथ स्वामी बताते हैं कि वे यहां शिक्षा ग्रहण करने के लिए लगातार आते रहे हैं, इसलिए यहीं के ही होकर रह गए हैं। उन्होंने बताया कि करीब 40-45 साल पहले दशहरा नेहरू पार्क के खाली पड़े स्थान पर मनाया जाता था। बाद में पार्क बन गया, जिसके बाद सुखाडि़या सçर्कल स्थित रामलीला मैदान में दशहरा मनाया जाने लगा। तब भी लोग गांवों से चलकर यहां दशहरा देखने आते थे, आज भी वैसी ही स्थिति है।

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