Tuesday, February 3, 2009

तब पाकोZ की जगह खेतों में हुआ करती थी सैर


बीते-गुजरे लम्हों की सारी बातें, यदि याद करें तो तड़फाती भी हैं और खुद को संभलने में मदद भी करती हैं। मिजेüवाला स्थित चक 12 क्यू निवासी मुख्त्यारसिंह 75 वर्ष की उम्र में भी घर के कई कामों को निपटाने लेते हैं। उम्र इनके किसी भी काम में आड़े नहीं आती। पुरानी यादों को कुदरेते हुए मुख्त्यारसिंह ने बताया कि आज खेती के लिए जमीने समतल हैं, लेकिन तब ऐसा नहीं थी। क्षेत्र के किसान परिवारों ने वक्त के साथ-साथ जमीनों को समतल किया। वे बताते हैं कि तब खेती वषाü के पानी पर ही निर्भर होती थी। पीने के पानी के लिए भी लोगों को जुगाड़ करना पड़ता था। सैर करने के लिए आज कस्बे में जहां पाकोZ का उपयोग किया जाता है, तब खेतों की हरियाली के बीच सुबह-सुबह घूमा करते थे। तली हुई चीजों को लोग बहुत कम खाते थे। आज व्यंजन के नाम पर सेहत से खिलवाड़ हो रहा है। तली हुई बाजार की वैरायटियां स्वास्थ्य के लिए कितनी हानिकारक हैं, इसका अंदाजा तब लगता है जब छोटी-छोटी कई बीमारियां इंसान को चपेट में ले लेती हैं। वे बताते हैं कि तब खिचड़ी-दलिया आदि विशेष व्यंजनों में आते थे। त्यौहार या अन्य किसी विशेष अवसर पर खीर, दलिया जैसी वैरायटियां बनाई जाती थीं। नाश्ते सहित दिन में तीन बार रोटी खाने का प्रचलन भी थोड़े समय से ही शुरू हुआ है, तब तो सुबह घर से निकलने से पहले व शाम को खाना खाया करते थे। मुख्त्यारसिंह कहते हैं कि आज सुविधाओं में बढ़ोत्तरी हुई, जो कुछ हद तक भविष्य के लिए फायदेमंद हैं।

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