Tuesday, March 3, 2009

महंगाई के दौर में वक्त की जरूरत हैं छोटे परिवार


कहते हैं कि वक्त जब बदलता है तो इंसान उसी दहलीज पर आ खड़ा होता है, जिसे वो कभी ठोकर मारकर चला गया था। इसलिए वक्त की कद्र करनी चाहिए। किसी गरीब के पहनावे को देखकर उसे दुत्कारना नहीं चाहिए। अपने दिल में कुछ ऐसी ही मंशा रखते हैं 82 वषीüय हनुमानप्रसाद शर्मा। जे-ब्लॉक निवासी शर्मा बताते हैं कि जिंदगी के बीते दिनों की हंसी यादें जीने की ताकत को बढ़ाने में मदद करती हैं तो फिर कैसे भूल जाएं उन पलों को। जिंदगी में माता-पिता की सेवा से बड़ा कोई परोपकार नहीं, यह खुद भी सीखा और दूसरों को भी सिखा रहे हैं। वे बताते हैं कि तब इंसान की रगों में मेहनत के साथ-साथ आत्मसंतुष्टि भी होती थी। काम-धंधों में आज जो मेहनत लगती है, उतनी तब भी लगा करती थी। लेकिन आज व्यक्ति में सब्र नजर नहीं आता। गर्मी के दिनों में कबड्डी बहुत खेला करते थे, लेकिन आज मानो जैसे कबड्डी खेलना जैसा शरीर ही किसी के पास नजर नहीं आता। कुश्ती-कबड्डी प्रमुख खेलों में शामिल थे। उन्होंने कहा कि तब बीमारियों का इलाज बिना डॉक्टरों के लोग घरों में देसी नुस्खों से कर लेते थे। करीब पचास साल पहले आठ-दस बच्चों का एक परिवार में होना तो आम बात होती थी। अब छोटे परिवार महंगाई के इस दौर में वक्त की जरूरत हो गए हैं। उन्होंने बताया कि कोई उनसे गुजरे जमाने की बातें सुनने आता है तो बहुत अच्छा महसूस होता है। बुजुगाüवस्था में ज्यादातर लोगों को गुजरना पड़ता है, इसलिए ऐसे कर्म करने चाहिए कि बुढ़ापा भी अच्छे ढंग से व्यतीत हो जाए।

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